दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-14

​इस दीर्घ कविता के पिछले भाग अर्थात् तेरहवें भाग में अभिमन्यु के गलत तरीके से किये गए वध में जयद्रथ द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका और तदुपरांत केशव और अर्जुन द्वारा अभिमन्यु की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए रचे गए प्रपंच के बारे में चर्चा की गई थी। कविता के वर्तमान प्रकरण अर्थात् चौदहवें भाग में देखिए कैसे प्रतिशोध की भावना से वशीभूत होकर अर्जुन ने जयद्रथ का वध इस तरह से किया कि उसका सर धड़ से अलग होकर उसके तपस्वी पिता की गोद में गिरा और उसके पिता का सर टुकड़ों में विभक्त…


इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् बारहवें भाग में आपने देखा अश्वत्थामा ने दुर्योधन को पाँच कटे हुए नर कंकाल समर्पित करते हुए क्या कहा। आगे देखिए वो कैसे अपने पिता गुरु द्रोणाचार्य के अनुचित तरीके के किये गए वध के बारे में दुर्योधन ,कृतवर्मा और कृपाचार्य को याद दिलाता है। फिर तर्क प्रस्तुत करता है कि उल्लू दिन में अपने शत्रु को हरा नहीं सकता इसीलिए वो रात में हीं घात लगाकर अपने शिकार पर प्रहार करता है। पांडव के पक्ष में अभी भी पाँचों पांडव , श्रीकृष्ण , शिखंडी , ध्रीष्टदयुम्न आदि और अनगिनत सैनिक मौजूद थे…


इस दीर्घ रचना के पिछले भाग अर्थात् ग्यारहवें भाग में आपने देखा कि युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद दुर्योधन मरणासन्न अवस्था में हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। आगे देखिए जंगली शिकारी पशु बड़े धैर्य के साथ दुर्योधन की मृत्यु का इन्तेजार कर रहे थे और उनके बीच फंसे हुए दुर्योधन को मृत्यु की आहट को देखते रहने के अलावा कोई चारा नहीं था। परंतु होनी को तो कुछ और हीं मंजूर थी । उसी समय हाथों में पांच कटे हुए नर कपाल लिए अश्वत्थामा का आगमन हुआ और दुर्योधन की मृत्यु…


दुर्योधन कब मिट पाया : भाग -11

इस दीर्घ कविता के दसवें भाग में दुर्योधन द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया गया है।अर्जुन सरल था तो उसके प्रति कृष्ण मित्रवत व्यवहार रखते थे, वहीं कपटी दुर्योधन के लिए वो महा कुटिल थे। इस भाग में देखिए , युद्ध के अंत में भीम द्वारा जंघा तोड़ दिए जाने के बाद मरणासन्न अवस्था में दुर्योधन हिंसक जानवरों के बीच पड़ा हुआ था। जानवर की वृत्ति रखने वाला योद्धा स्वयं को जानवरों के बीच…


दीर्घ कविता के इस भाग में दुर्योधन के बचपन के कुसंस्कारों का संछिप्त परिचय , दुर्योधन द्वारा श्रीकृष्ण को हरने का असफल प्रयास और उस असफल प्रयास के प्रतिउत्तर में श्रीकृष्ण वासुदेव द्वारा स्वयं के विभूतियों के प्रदर्शन का वर्णन किया है। श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एक दर्पण की भांति है, जिसमे पात्र को वो वैसे हीं दिखाई पड़ते हैं , जैसा कि वो स्वयं है। दुर्योधन जैसे कुकर्मी और कपटी व्यक्ति के लिए वो छलिया है जबकि अर्जुन जैसे सरल ह्रदय व्यक्ति के लिए एक सखा । युद्ध शुरू होने से पहले जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों गिरिधर की सहायता…


कोरोना के दुसरे दौर का प्रकोप कम हो चला था । दिल्ली सरकार ने थोड़ी और ढील दे दी थी । डिस्ट्रिक्ट कोर्ट थोड़े थोड़े करके खोले जा रहे थे । मित्तल साहब का एक मैटर तीस हजारी कोर्ट में लगा हुआ था ।

जज साहब छुट्टी पे थे । उनके कोर्ट मास्टर को कोरोना हो गया था । लिहाजा कोर्ट से तारीख लेकर टी कैंटीन में चले गए । सोचा चाय के साथ साथ मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी ।

वहाँ पे उनके मित्र चावला साहब भी मिल गए । दोनों मित्र चाय की चुस्की लेने लगे ।…


दुर्योधन भले हीं खलनायक था ,पर कमजोर नहीं । श्रीकृष्ण का रौद्र रूप देखने के बाद भी उनसे भिड़ने से नहीं कतराता । तो जरूरत पड़ने पर कृष्ण से सहायता मांगने भी पहुँच जाता है , हालाँकि कृष्ण द्वारा छला गया , ये और बात है । उसकी कुटनीतिक समझ पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा सकता । युद्ध के अंत में जब अश्वत्थामा उसको पांडव पुत्रों के कटे हुए सर लाता है तो दुर्योधन पछताता है ,परन्तु अश्वत्थामा खुश हीं होता है ।अश्वत्थामा इस बात से खुश होता है कि अच्छा हीं हुआ कि उसका बदला पूर्ण हुआ । जैसे वो अपने पिता के हत्या का बोझ सिर पे लिए जीता है , ठीक वैसे हीं पांडव भी जीते जी पुत्रों के वध की आग में जियेंगे । खुश दोनों हैं , पर दुर्योधन खुश होने के और महाभारत युद्ध लड़ने के अपने कारण बताता है । प्रस्तुत है दीर्घ कविता दुर्योधन कब मिट पाया , दीर्घ कविता का नौवां भाग ।

रिपु भंजक की उष्ण नासिका से उद्भट सी श्वांस चले,

अति कुपित हो अति वेग से माधव मुख अट्टहास फले।

उनमें स्थित थे महादेव ब्रह्मा विष्णु क्षीर सागर भी ,

क्या सलिला क्या जलधि जलधर चंद्रदेव दिवाकर भी।

देदीप्यमान उन हाथों में शारंग शरासन, गदा , शंख ,

चक्र खडग नंदक चमके जैसे विषधर का तीक्ष्ण डंक।

रुद्र प्रचंड थे केशव में, केशव में यक्ष वसु नाग पाल ,

आदित्य अश्विनी इन्द्रदेव और दृष्टित सारे लोकपाल।

एक भुजा में पार्थ उपस्थित दूजे में सुशोभित हलधर ,

भीम ,नकुल,सहदेव,युधिष्ठिर नानादि आयुध गदा धर।

रोम कूप से बिजली कड़के गर्जन करता विष…


वहम

जून का महीना था। शाम के 6 बजे थे फिर भी काफी तेज रोशनी थी सड़क पर। अमूमनतया दिल्ली में इस समय तक काफी गर्मी पड़ने लगती है। परंतु दिल्ली सरकार द्वारा कोरोना की दूसरी लहर से बचने के लिए जो लॉक डाउन लागू किया गया था , उसका असर सड़कों पर साफ साफ दिखाई पड़ रहा था। नेहरू प्लेस की मुख्य सड़क लगभग सुनसान हीं थीं। कार पार्किंग में जहाँ गाड़ियाँ पहले ठसाठस भरी रहती थी , आज वो लगभग खाली थी।

जहाँ पहले बाइक , ऑटो रिक्शा , कार और बसों की शोरगुल से सारा वातावरण अशांत…


दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-8

शठ शकुनि से कुटिल मंत्रणा करके हरने को तैयार,

दुर्योधन समझा था उनको एक अकेला नर लाचार।

उसकी नजरों में ब्रज नंदन राज दंड के अधिकारी,

भीष्म नहीं कुछ कह पाते थे उनकी अपनी लाचारी।

धृतराष्ट्र विदुर जो समझाते थे उनका अविश्वास किया,

दु:शासन का मन भयकम्पित उसको यूँ विश्वास दिया।

जिन हाथों संसार फला था उन हाथों को हरने को,

दुर्योधन ने सोच लिया था ब्रज नन्दन को धरने को।

नभपे लिखने को लकीर कोई लिखना चाहे क्या होगा?

हरि पे धरने को जंजीर कोई रखना चाहे क्या होगा?

दीप्ति जीत हीं जाती है वन…


दुर्योधन कब मिट पाया:भाग-7

राजसभा में जिस दुर्योधन ने सबका अपमान किया,

वो ही वक्त के पड़ने पर गिरिधर की ओर प्रस्थान किया।

था किशन कन्हैया की शक्ति का दुर्योधन को भान कहीं,

इसीलिए याचक बनकर पहुंचा तज के अभिमान वही।

अर्जुन ईक्छुक मित्र लाभ को माधव कृपा जरूरी थी,

पर दुर्योधन याचक बन पहुँचा था क्या मजबूरी थी?

शायद केशव को जान रहा तभी तो वो याचन करता था,

एक तरफ जब पार्थ खड़े थे दुर्योधन भी झुकता था।

हाँ हाँ दुर्योधन ब्रजवल्लभ माधव कृपा का अभिलाषी ,

जान चुका उनका वैभव यदुनन्दन केशव अविनाशी।

पर गोविन्द भी ऐसे…

Ajay Amitabh Suman

[IPR Lawyer & Poet] Delhi High Court, India Mobile:9990389539

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