ख़्वाहिशें

जीवन की तमाम मुश्किलात हालातों से जूझते हुए कवि अपनी जिंदगी को खुशनुमा तरीके से कैसे गुजार रहा है, ये कविता कवि के उस नजरिये को दिखाती है।

ख्वाहिशों की बात में इतना सा फन रखा ,

जो हो सके ना पूरी उनका दमन रखा।

जरूरतों की आग ये जला भी दे ना मुझको,

तपन बढ़ी थी अक्सर बाहोश पर बदन रखा।

हादसे जो घट गए थे रोना क्या धोना क्या,

आ गई थीं मुश्किलें जो उनको दफ़न रखा।

हसरतों जरूरतों के दरम्यान थी जिन्दगी ,

इस पे लगाम थोड़ा उस पे कफन रखा।

मुसीबतों का क्या था, थी रुबरु पर बेअसर,

थी सोंच में रवानी जज्बात में अगन रखा।

रूआब नूर-ए-रूह में कसर रहा ना बाकी ,

थीं जिनसे भी नफरतें इतनी भी अमन रखा।

खुशबुओं की राह में थी फूलों की जरुरत ,

काँटों से ना थी दुश्मनी उनको जतन रखा।

जिंदगी की फ़िक्र क्या मौज में कटती गई ,

बुढ़ापे की राह थी पर जिन्दा चमन रखा।

--

--

--

[IPR Lawyer & Poet] Delhi High Court, India Mobile:9990389539

Get the Medium app

A button that says 'Download on the App Store', and if clicked it will lead you to the iOS App store
A button that says 'Get it on, Google Play', and if clicked it will lead you to the Google Play store
Ajay Amitabh Suman

Ajay Amitabh Suman

[IPR Lawyer & Poet] Delhi High Court, India Mobile:9990389539

More from Medium

Thoughts From My Journal — Joshua Tree

Go ahead!

This poem came during a two-night back-packing trip in spring 2003.

Myself .1