शांति की पुकार

किसी मनोहर बाग में एक दिन ,
किसी मनोहर भिक्षुक गाँव ,
लिए हाथ में पुष्प मनोहर ,
बुद्ध आ बैठे पीपल छाँव .

सभा शांत थी , बाग़ शांत था ,
चिड़ियाँ गीत सुनाती थीं .
भौरें रुन झुन नृत्य दिखाते ,
और कलियाँ मुस्काती थी .

बुद्ध की वाणी को सुनने को ,
सारे तत्पर भिक्षुक थे ,
हवा शांत थी ,वृक्ष शांत सब,
इस अवसर को उत्सुक थे .

उत्सुक थे सारे वचनों को ,
जब बुद्ध मुख से बोलेंगे ,
बंद पड़े जो मानस पट है ,
बुद्ध वचनों से खोलेंगे.

सम धार बहती जाती थी ,
बुद्ध कुछ भी न कहते थे ,
मन में क्षोभ विकट था अतिशय ,
सब भिक्षुक जन सहते थे .

इधर दिवस बिता जाता था ,
बुद्ध बैठे थे ठाने मौन ,
ये कैसी लीला स्वामी की ,
बुद्ध से आखिर पूछे कौन ?

काया सबकी बाग में स्थित ,
पर मन दौड़ लगाता था ,
भय ,चिंता के श्यामल बादल ,
खींच खींच के लाता था.

तभी अचानक जोर से सबने ,
हँसने की आवाज सुनी ,
अरे अकारण हँसता है क्यूँ ,
ओ महाकश्यप, महा गुणी .

गौतम ने हँसते नयनों से ,
महाकश्यप को दान किया ,
कुटिया में जाने से पहले ,
वो निज पुष्प प्रदान किया .

पर उसको न चिंता थी न,
हँसने को अवकाश दिया ,
विस्मित थे सारे भिक्षुक क्या,
गौतम ने प्रकाश दिया .

तुम्हीं बताओ महागुणी ये ,
कैसा गूढ़ विज्ञान है ?
क्या तुम भी उपलब्ध ज्ञान को ,
हो गए हो ये प्रमाण है?

कहा ठहाके मार मार के ,
महाकश्यप गुणी सागर ने ,
परम तत्व को कहके गौतम ,
डाले कैसे मन गागर में?

शांति की आवाज सुन सको ,
तब तुम भी सब डोलोगे ,
बुद्ध तुममें भी बहना चाहे ,
तुम मन पट कब खोलोगे?

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