व्यापार

दिल की जो बातें थीं सुनता था पहले,

सच ही में सच था जो कहता था पहले।

करने अब सच से खिलवाड़ आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

कमाई की खातिर दबाता है सब को ,

गिरा कर औरों को उठता है खुद को।

कि जेहन में उसके जुगाड़ आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

मुनाफे की बातें ही बातें जरूरी।

दिन में जरूरी , रातों को जरूरी।

देख वायदों में उसके करार आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

मूल्यों सिद्धांतों की बातें हैं करता,

मूल्यों सिद्धांतों की बातों से डरता,

कथी करनी में तकरार आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

नहीं कोई ऐसा छला जिसेको जग में,

शामिल दिखावा हर डग, पग, रग में।

जब करने अपनों पे प्रहार आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

पैसे की चिंता हीं उसको भगाती,

दिन में बेचैनी , रातों को जगाती।

दौलत पे हीं उसको प्यार आ गया,

लगता है उसको व्यापार आ गया।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

[IPR Lawyer & Poet] Delhi High Court, India Mobile:9990389539

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