छल

सुबह का वक्त था। राजा महेंद्र सिंह राठौड़ अपने रथ में बैठकर रानी अरुणिमा सिंह के साथ नौका विहार हेतु अपने महल से बाहर जा रहे थे। अपनी रानी के साथ वो अकेले समय व्यतीत करना चाह रहे थे। इसलिए 2–4 विश्वासपात्र सेवकों को ही साथ रखा था। घोड़े द्रुत गति से आगे बढ़े चले जा रहे थे। आस पास का दृश्य बड़ा हीं मनोरम था।अचानक रथ के पहिए की कील निकल गई। आस पास नजदीक कोई बनाने वाला था भी नहीं। दोनों को अपने रथ से नीचे उतरना पड़ा।

अभी धूप चढ़ हीं रही थी। दोपहर तक रथ के ठीक होने की उम्मीद थी। रानी पास ही शाही शिविर लगाकर आराम करने लगी। राजा महेंद्र सिंह अपने घोड़े पे बैठकर आस पास घूमने लगे। चारो तरफ चिड़ियाँ चहचहा रहीं थीं। फूलों की खुशबू से वातावरण सुगंधित हो उठा था।राजा ने रानी से अपने साथ घोड़े पर चलने को कहा। रानी आराम करना चाह रही थी। ईक्क्षा नहीं होने पर भी राजा की भावना का सम्मान करते हुए घोड़े पर बैठ गई। दोनों साथ साथ चलते 2–3 मील आगे बढ़ आये। पास हीं एक मनोरम तालाब था। राजा उस तालाब में उतरकर जल क्रीड़ा का आनंद लेने लगे। रानी दोपहर के जलपान की व्यवस्था को देखने के लिए वापस शिविर में लौट आयी।

राजा के सेवक उनसे दूर चले गए ताकि उनकी जल क्रीड़ा में व्यवधान ना पहुँचे। काफी सुकून मिल रहा था राजा को। अचानक उनको लगा किसी ने जल में उनके पैरों को छुआ। राजा को लगा शायद किसी जलीय पौधे से उनके पैर का स्पर्श हुआ है। वो नजर अंदाज करके फिर तालाब में जल क्रीड़ा का आनंद लेने लगे। थोड़ी देर में फिर ऐसा लगा किसी ने उनके भुजा को स्पर्श किया हो। राजा का मन आशंकित हो उठा। वो तुरंत तालाब के किनारे जाने की कोशिश करने लगे। थोड़ी देर में लगा किसी ने उनको अपनी बाहों में जकड़ लिया। राजा की धड़कने तेज हो उठी। फिर उन्होंने देखा उनको एक खुबसूरत जलपरी ने अपनी बाहों के घेरे में जकड़ रखा था। उसकी आँखों में प्रणय निवेदन था। राजा का मन चंचल हो उठा। अचानक तालाब में अनेक जलपरियाँ दृष्टिगोचित हो उठी। सबकी आंखों में राजा के प्रति प्रणय निवेदन था। राजा घबड़ा उठे। रानी को जोर जोर से चिल्लाकर बुलाने लगे।

अचानक उनकी नींद खुल गयी। रानी को अपने पास देख कर उन्हें बड़ा अच्छा लगा। जब रानी ने उनसे घबड़ाने का कारण पूछा तो राजा ने अपने सपने की बात बता दी। रानी हंसने लगीं। बोली मर्दों के सपनों में चुड़ैलें परियाँ बनकर आती हैं।

राजा ने पूछा:क्या आपके सपने में पर पुरुष आते हैं?

रानी:हाँ देवता हैं, पिता आते हैं, गुरुदेव आते हैं।

राजा:नहीं नहीं, प्रणय निवेदन के साथ कोई पर पुरुष आता है क्या?

रानी की भृकुटि तन गई। गुस्साते हुए उन्होंने उत्तर दिया:महाराज आपने मुझे पुरुष समझ रखा है क्या? मेरे सपने में भी आपके अलावा किसी पर पुरुष को प्रणय निवेदन के साथ आने की अनुमति नहीं है।

राजा दुखी हो उठे। वो अपनी पत्नी को बहुत प्रेम करते थे। उन्हें अपनी पत्नी का उत्तर सुनकर गर्व हुआ साथ हीं स्वयं के सपने की बात याद कर ग्लानि भी हुई।उनके मन में अनगिनत शंका के बादल मडराने लगे।क्या वो कामी है?क्या उनका प्रेम रानी के प्रति झूठा है?क्या वो इतने कमजोर हैं कि सपनों में दूसरी स्त्रियों को आने की इजाजत दे देते हैं?

राजा को शांत देख कर रानी ने अपने पति के मन में उठते शंका के बादल को भांप लिया।

रानी ने कहा:महाराज उदास न हों। पुरुष स्वभावतः हीं चंचल होते हैं, जबकि स्त्रियां दृढ़प्रतिज्ञ और स्थिर।

राजा ने पूछा:क्या ये सत्य है?

रानी:हाँ महाराज, देखिए रावण, दुर्योधन आदि ने हमेशा से स्त्रियों को वासना की नजर से देखा है। पुरुष हीं स्त्रियों के पीछे भागते है। स्त्रियाँ पुरुष के पीछे नहीं भागती। ये प्रकृति का अंग है।

एक शादी शुदा स्त्री अपने पति के प्रति स्वभावतः समर्पित होती हैं। जबकि पुरुष के साथ ऐसा नहीं है। माता गांधारी के बारे में सर्व विदित है कि महाराज धृतराष्ट्र के अंधा होने के कारण उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध लिया, पर जब गांधारी गर्भवती हुई तो महाराज धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास कर एक पुत्री का जन्म दिया, जिसका पति जयद्रथ था।

राजा:पर द्रौपदी के तो पाँच पाँच पति थे। फिर आप कैसे कह सकती हैं कि स्त्रियाँ स्वभावतः एक मार्गी होती हैं ?

रानी: महाराज आपको ज्ञात है , स्वर्गोरण के दौरान जब द्रौपदी मरणासन्न हुई तो युधिष्ठिर ने उसका कारण क्या बताया था ? चूँकि द्रौपदी सिर्फ अर्जुन को प्यार करती थी इसलिए उसने पांच पति धर्म का पालन सही तरीके से नहीं किया था। महाराज द्रौपदी ने सिर्फ अर्जुन का वरण किया था , इसीलिए पांच पतियों के थोपे जाने के बावजूद सिर्फ अर्जुन को प्यार करती रही। स्त्रियाँ स्वभावतः एक मार्गी हीं होती हैं।

आप देखिए आपने सिर्फ द्रौपदी का उदाहरण दिया। यहाँ तो भगवान श्रीकृष्ण 16,000 से ज्यादा स्त्रियों के साथ शादी करते हैं । और तो और अर्जुन ने 4–4 शादियाँ की थी । भीम ने 3, तो युद्धिष्ठिर , नकुल और सहदेव ने 2–2 शादियाँ की थी । मैं पुरुष कि निंदा नहीं कर रही , बल्कि वास्तविकता बता रही हूँ महाराज ।

राजा : पर कुंती ने भी तो सूर्य , इंद्र और अश्विनी कुमारों से सहवास किया था।

रानी : पर वो तो अपनी पति की आज्ञा और सहमति से । कर्ण का जन्म तो खेल खेल में हो गया था। कुंती का मन चंचल तो नहीं था। पुरुष का मन तो चंचल होता हीं है। इसीलिए जब जब कोई भी पुरुष तपस्या करता है तो अप्सराएँ भेजी जाती हैं , ध्यान भंग करने के लिए। विश्वामित्र और मेनका इसके जीते जागते उदाहरण है । परन्तु जब कोई स्त्री तपस्या करती है तो क्या कोई पुरुष भेजा गया उसका ध्यान भंग करने के लिए ? बड़े बड़े सम्राटों का वध करने के विष कन्यायें भेजी जाती हैं क्यों कि पुरुष का मन कमजोर होता है, उनका मन विचलित हो जाता है । स्त्रियों के साथ एसा नहीं होता ।

महाराज को अपनी विदुषी पत्नी के तर्कसंगत बातों का उत्तर नहीं सूझ रहा था ।

फिर भी महाराज ने जालंधर की पत्नी और गौतम मुनि के पत्नी अहिल्या का उदाहरण दिया।

रानी हँसते हुए बोली , महाराज ये तो आप जानते हीं हैं , भगवान विष्णु और चन्द्र देवता ने जालंधर कि पत्नी और गौतम मुनि के पत्नियों के सतीत्व हरण छल से किया था । इन दोनों ने उनके पतियों का रूप धारण करके हीं उनका सतीत्व हरण किया था ।

राजा : हां रानी , बात तो आपकी सही प्रतीत हो रही है। रावण ने भी सीता का हरण छल से हीं किया था।

लेकिन महारानी आप एक बात तो आप जानती हीं हैं कि वृहस्पति की पत्नी तारा ने अपने पति का त्याग कर अपने प्रेमी चन्द्र देवता का वरण किया था और बुद्ध को जन्म दिया। फिर आप कैसे कह सकती है कि स्त्री का मन चंचल नहीं होता ?

महाराज को लगा था कि शायद के उदाहरण उनको कुछ बचा सकता है। पर उनका ये हथियार भी खाली गया। रानी ने कहा कि चंचल तो चन्द्र देव को हीं कहा गया है , तारा को नहीं । इसका एक हीं कारण है कि तारा ने अपने प्रेम का वरण किया था जबकि चन्द्र देव ने दुसरे की पत्नी का हरण। स्त्री जब प्रेम का चुनाव कर लेती है तो फिर पीछे नहीं हटती। जबकि पुरुष का प्रेम तो बदलते रहता है । स्त्रियाँ धरा की भांति है जो पुरुष रूपी बादल का इन्तेजार करती है । ये तो पुरुष है जो बदलते समय के साथ इधर उधर भटकते हुए प्रेम की बारिश करते रहता है।

रानी लगातार बोलती जा रहे थे और अपनी महारानी की विद्वतापूर्ण बातो को ध्यानपूर्वक सुनते रहे ।

हाँ महाराज , स्त्रियाँ अपने प्रेम का वरण करती हैं , जबकि पुरुष किसी भी हाल में प्रेम चाहता है , चाहे इसके लिए स्त्री का हरण हीं क्यों न करना पड़े । स्त्रियों को संतानोत्पत्ति करनी होती है , उसे गर्भधारण करना होता है , इसीलिए उसका शांत होना जरुरी है।उसका एकांगी होना जरुरी है । उसका एकनिष्ठ होना जरुरी है । जबकि पुरुष को हमेशा सहवास के लिए तैयार रहना पड़ता है।इसीलिए स्त्रियों के पास अंडाणु एक विशेष समय हीं तैयार मिलते हैं , जबकि पुरुष के पास करोड़ों शुक्राणु हमेशा तैयार रहते हैं। इसीलिए पुरुष का चंचल होना जरुरी है । यदि स्त्रियाँ भी पुरुष की तरह हो जाएं तो वे हमेशा गर्भधारण करती रहेंगीं । इसीलिए प्रकृति ने स्त्री हो शांत को एक निष्ठ बनाया है और पुरुष को चंचल। इसीलिए छल और चंचलता पुरुष का स्वभाव है जबकि समर्पण एक निष्ठता स्त्री का। वरण स्त्री का स्वभाव है जबकि हरण पुरुष का।

महाराज को रानी की बात स्वीकार करनी हीं पड़ी। पर वो हारकर भी जीत गए थे। अपनी आत्म ग्लानि के भाव से बाहर निकल चुके थे। जबकि रानी जीतकर कर हार गई थी , और हार कर भी खुश थी। ये रानी का प्रेम था , ये रानी का समर्पण था।

अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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[IPR Lawyer & Poet] Delhi High Court, India Mobile:9990389539

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Ajay Amitabh Suman

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