क्यों नर ऐसे होते हैं?

कवि को ज्ञात है कि ईश्वर हर जगह बसता है. फिर भी वह कुछ ऐसे लोगों के संपर्क में आता है , जो काफी नकारात्मक हैं . कवि चाह कर भी इन तरह के लोगों में प्रभु के दर्शन नहीं कर पाता . इन्हीं परिस्थियों में कवि के मन में कुछ प्रश्न उठते हैं , जिन्हें वो इस कविता के माध्यम से ईश्वर से पूछता है .

क्यों नर ऐसे होते हैं?

कवि यूँ हीं नहीं विहँसता है,

है ज्ञात तू सबमें बसता है,

चरणों में शीश झुकाऊँ मैं,

और क्षमा तुझी से चाहूँ मैं।

दुविधा पर मन में आती है,

मुझको विचलित कर जाती है ,

यदि परमेश्वर सबमें होते,

तो कुछ नर क्यूँ ऐसे होते?

जिन्हें स्वार्थ साधने आता है,

कोई कार्य न दूजा भाता है,

न औरों का सम्मान करें ,

कमजोरों का अपमान करें।

उल्लू नजरें है जिनकी औ,

गीदड़ के जैसा है आचार,

छली प्रपंची लोमड़ जैसे,

बगुले जैसा इनका प्यार।

कौए सी है इनकी वाणी,

करनी है खुद की मनमानी,

जाते चंडाल कुटिल भी ,

मांगे शकुनी इनसे पानी।

संचित करते रहते ये धन,

होते मन के फिर भी निर्धन,

तन रुग्ण है संगी साथी ,

पर परपीड़ा के अभिलाषी।

जोर किसी पे ना चलता,

निज-स्वार्थ निष्फलित है होता,

कुक्कुर सम दुम हिलाते हैं,

गिरगिट जैसे हो जाते हैं।

कद में तो छोटे होते हैं ,

पर साये पे हीं होते है,

अंतस्तल में जलते रहते,

प्रलयानिल रखकर सोते हैं।

गर्दभ जैसे अज्ञानी है,

हाँ महामुर्ख अभिमानी हैं।

पर होता मुझको विस्मय,

करते रहते नित दिन अभिनय।

प्रभु कहने से ये डरता हूँ,

तुझको अपमानित करता हूँ ,

इनके भीतर तू हीं रहता,

फिर जोर तेरा क्यूँ ना चलता?

क्या गुढ़ गहन कोई थाती ये?

ईश्वर की नई प्रजाति ये?

जिनको न प्रीत न मन भाये,

डर की भाषा हीं पतियाये।

अति वैभव के हैं जो भिक्षुक,

परमार्थ फलित ना हो ईक्छुक,

जब भी बोले कर्कश वाणी,

तम अंतर्मन है मुख दुर्मुख।

कहते प्रभु जब वर देते हैं ,

तब जाके हम नर होते हैं,

पर है अभिशाप नहीं ये वर,

इनको कैसे सोचुं ईश्वर?

ये बात समझ ना आती है,

किंचित विस्मित कर जाती है,

क्यों कुछ नर ऐसे होते हैं,

प्रभु क्यों नर ऐसे होते हैं?

अजय अमिताभ सुमन

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